TIL KI KHETI: किसानों के लिए मुनाफे का सुनहरा अवसर, यूपी सरकार दे रही अनुदान

उत्तर प्रदेश में तिल की खेती को मिल रहा सरकारी प्रोत्साहन, बीजों पर सब्सिडी और वैज्ञानिक तरीकों से बढ़ाएं उत्पादन और आमदनी।

TIL KI KHETI: तिल की खेती भारतीय किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनती जा रही है, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, जहां इसकी खेती खरीफ मौसम में बड़े पैमाने पर की जाती है। गर्म और शुष्क जलवायु में उगने वाली इस तिल की फसल में लागत कम और मुनाफा अधिक होता है।

जलवायु और भूमि की आवश्यकता

पूर्व कृषि निदेशक डॉ. जितेंद्र कुमार तोमर के अनुसार, तिल की खेती के लिए गर्म व शुष्क मौसम आदर्श होता है। यह फसल दोमट या हल्की बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी होती है, जिसमें जल निकासी बेहतर हो और मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो।

बुवाई का सही समय खरीफ सीजन में जुलाई के अंतिम सप्ताह तक माना जाता है। पंक्ति-दर-पंक्ति की दूरी 30-45 सेमी और पौधे-दर-पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखने से उत्पादन बढ़ता है।

सरकार की पहल: बीज पर अनुदान

उत्तर प्रदेश सरकार तिल की खेती को बढ़ावा देने के लिए बीज पर ₹95 प्रति किग्रा का अनुदान दे रही है। इससे किसानों की उत्पादन लागत घटती है और उन्हें बेहतर लाभ मिलता है।

राज्य में कृषि विभाग किसानों को वैज्ञानिक विधियों से तिल की खेती करने के लिए प्रशिक्षण भी दे रहा है। तिल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹9846 प्रति क्विंटल निर्धारित है।

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कृषि क्षेत्र में उपयोग और उत्पादन

राज्य में खरीफ सीजन के दौरान करीब 5 लाख हेक्टेयर भूमि में तिल की खेती होती है। यह फसल विशेष रूप से कम वर्षा और असमतल क्षेत्रों में उपयुक्त रहती है, जहां जलभराव की समस्या न हो।

कृषि निवेश बहुत कम होता है, लेकिन तिल का बाजार मूल्य अधिक होने से प्रति हेक्टेयर अच्छी आमदनी होती है।

बीज की प्रमुख किस्में और उपचार TIL KI KHETI

प्रमुख तिल किस्मों में शामिल हैं:

  • RT-346, RT-351

  • गुजरात तिल-6, RT-372, MT-2013-3

  • BUAT तिल-1

बीज बोने से पहले बीज उपचार करना जरूरी है:

  • थिरम या कार्बेन्डाजिम (2.5 ग्राम/किग्रा)

  • या ट्राइकोडर्मा (4 ग्राम/किग्रा) – इससे बीज व मृदा जनित रोगों से बचाव होता है और अंकुरण बेहतर होता है।

फसल सुरक्षा के उपाय

  • खरपतवार नियंत्रण: बुवाई के तुरंत बाद पेडीमेथालिन का छिड़काव करें

  • सिंचाई: वर्षा आधारित खेती में जरूरत नहीं, लेकिन फूल आने और दाना भरने की अवस्था में सिंचाई जरूरी होती है

  • रोग नियंत्रण:

    • थायोफेनेट मिथाइल या कार्बेन्डाजिम (तना व फल सड़न)

    • मैनकोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (पत्ती झुलसा)

  • कीट नियंत्रण: केवल गंभीर नुकसान की स्थिति में डाइमेथोएट या क्विनालफॉस का छिड़काव करें।

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उत्पादन और संभावित आय

परंपरागत विधियों से तिल की उपज 4-6 क्विंटल/हेक्टेयर, जबकि वैज्ञानिक विधियों से 8-12 क्विंटल/हेक्टेयर तक हो सकती है।

₹9846 प्रति क्विंटल MSP के हिसाब से, एक किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग ₹1 लाख तक की आय हो सकती है।

कटाई का सही समय तब है, जब 70-80% फलियाँ पीली पड़ जाएं। इसके बाद फसल को काटकर अच्छी तरह धूप में सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए।

पोषण और औषधीय गुण

तिल सिर्फ एक खाद्य फसल नहीं, बल्कि पोषण और औषधीय दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है:

  • प्रोटीन (20.9%), वसा (53.5%), लेकिन कोलेस्ट्रॉल शून्य

  • विटामिन A, B1, B2, B6, B11

  • पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और जिंक से भरपूर

औषधीय रूप से तिल का उपयोग:

  • रक्तचाप, शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण

  • एंटीबैक्टीरियल, एंटी-कैंसर गुण

  • तिल का तेल स्वास्थ्यवर्धक और पाचन के लिए उपयुक्त माना जाता है, जिसे आयुर्वेद में भी रोज़ाना उपयोग की सलाह दी जाती है।

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किसान कहां संपर्क करें?

किसान भाई राजकीय कृषि रक्षा इकाई, जिला कृषि अधिकारी या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करके अधिक जानकारी और तकनीकी सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।


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