पपीते की फसल: बारिश में कॉलर रॉट रोग से हो सकता है भारी नुकसान
बारिश के मौसम में पपीते की फसल को बचाएं कॉलर रॉट जैसी फफूंदजनित बीमारी से – जानिए लक्षण, कारण और वैज्ञानिक बचाव के उपाय।

बारिश के मौसम में पपीते की फसल को एक खतरनाक बीमारी – कॉलर रॉट – से बड़ा नुकसान हो सकता है। यह रोग पौधों की जड़ों और तनों को सड़ा देता है, जिससे पूरा पौधा मर जाता है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। समय रहते इसके लक्षणों की पहचान और इलाज बेहद जरूरी है। आइए जानें इसके लक्षण, कारण और बचाव के आसान वैज्ञानिक तरीके।
क्या है कॉलर रॉट रोग?
यह रोग मुख्य रूप से बारिश के मौसम में फैलता है, जब मिट्टी में अत्यधिक नमी होती है। यह फफूंदजनित बीमारी होती है, जो Pythium, Rhizoctonia और Phytophthora जैसे कवकों के कारण फैलती है। यह पपीते के तने के निचले हिस्से (कॉलर एरिया) पर हमला करता है और पौधे को धीरे-धीरे पूरी तरह सड़ा देता है।
कॉलर रॉट के लक्षण कैसे पहचानें?
तने के निचले हिस्से पर गीले और नरम धब्बे दिखना
धब्बों का तेजी से फैलना और तने को चारों तरफ से घेर लेना
पौधे का पोषण बंद होना, तना काला पड़ना और गिरना
छाल के नीचे का ऊतक मधुमक्खी के छत्ते जैसा दिखना
पौधे का सूख जाना और मर जाना
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कॉलर रॉट से बचाव के लिए जरूरी उपाय…. पपीते की फसल
1. रोगग्रस्त पौधे हटाएं
जैसे ही किसी पौधे में कॉलर रॉट के लक्षण दिखें, उसे जड़ सहित उखाड़कर दूर फेंक दें या जला दें, ताकि बीमारी अन्य पौधों में न फैले।
2. जल निकासी बेहतर बनाएं
पपीते के खेत में पानी जमा न हो, इसके लिए खेत में पंक्तियों के बीच गहरी नालियां बनाएं।
3. मिट्टी की जांच और रोटेशन
यदि पहले इस रोग का प्रकोप हुआ हो, तो उस खेत में 2-3 वर्षों तक पपीते की खेती न करें। मिट्टी की pH जांचें और जैविक तत्व संतुलित रखें।
रासायनिक नियंत्रण (Fungicide Treatment)
कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3 ग्राम/लीटर पानी) – मिट्टी में डालें
10 दिन बाद मेटालैक्सिल + मैन्कोजेब (2 ग्राम/लीटर पानी) – उपयोग करें
प्रति पौधा कम से कम 5 लीटर घोल डालें
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जैविक और प्राकृतिक उपाय
ट्राइकोडर्मा विरिडे को मिट्टी में मिलाएं
वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का प्रयोग करें, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हो
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जैविक विधियों को प्राथमिकता दें
IPM अपनाएं – Integrated Pest Management
समेकित रोग प्रबंधन (IPM) के अंतर्गत समय पर निरीक्षण, जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित प्रयोग करके कॉलर रॉट जैसी बीमारियों से फसल को बचाया जा सकता है।
पपीता किसानों को चाहिए कि वे बारिश के मौसम में फसल की सतर्क निगरानी रखें। जैसे ही कोई लक्षण दिखे, तुरंत एक्शन लें। सही समय पर सही उपाय अपनाकर कॉलर रॉट जैसी घातक बीमारी से पपीते की फसल को बचाया जा सकता है।
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